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| Dr.Bhimrao Ambedkar |
डॉ. भीमराव अम्बेडकर
जन्म एवं बचपन
विदेशी दासता की बेड़ियाँ हमारे देश को जकड़े थी। कुरीतियाँ समाज को प्रभामण्डल को क्षीण कर रही थी। जाति-पांति और छुआछूत का कोहरा चहुंओर आच्छादित
था। घने काले मेघों के बीच से प्रकट होने वाले रवि के समान विकट परिस्थितियों के बीच
इस धरा पर एक दिव्य प्रतिभा ने जन्म लिया।
उस मेघावी बालक का नाम था भीमराव आज से 118 वर्ष पूर्व 14 अप्रैल 1891 को महू कैट इन्दौर में जन्मे भीमराव का परिवार महार नामक जाति से था। वह अपने माता
पिता की चौदहवी सन्तान थे। वह अपने आपको चौदहवां रत्ल कहकर बहुत खुश होते थे। माँ
भीमाबाई आंखों का तारा मानती थी उन्हें गोद में खिलाती और दूलार से कहा करती, मेरा
भीम बड़ा आदमी बनेगा’ माँ भीमाबाई का वह सपना साकार हुआ। आगे चलकर वही
बालक डॉ. भीमराव अम्बेडकर के रूप में आमजन के मसीहा बने और विश्वविख्यात हुए।
भीम के दादा का नाम मालोजी राव था। वे अंग्रेजी सेना में हवलदार के पद पर थे।
वीरता के लिए उनको 16 तमगे प्राप्त हुए।
उनके पुत्र और भीम के पिता रामजी समपाल भी अंग्रेजी सेना में सूबेदार के पद पर
कार्यरत थे। श्री समपाल वर्ष 1894 में सेना से सेवानिवृत्त हुए। वे सपरिवार दापोती आ बसे
थे। सन् 1896 में उनको सतारा में PWD. के कार्यालय में स्टोर कीपर की नौकरी मिल गई।
वे अपने परिवार को भी दापोली से सतारा ले गये
भीम का शरीर हृष्ट-पुष्ट था। वे स्वभाव से स्वाभिमानी थे।
मस्तिष्क के लिए अध्ययन की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी शरीर
को व्यायाम की।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर
अपनी आन पर जिद पकड़ लेते और आने वाले लक्ष्य को प्राप्त करके ही दम लेते थे। आगे
चलकर यही स्वाभिमान शौर्य साहस और आन पर मर मिटने का दृढ़ कदम पर कदम उनका
मार्ग प्रशस्त करते रहे।
भीम को बचपन से ही किताबों के प्रति लगन थी। अबोध और निरक्षर बालक को
जब भी कोई लिखा पन्ना हाथ लगता वह उस पर लिखे एक एक शब्द को इतने मनोयोग से
देखता मानो ये शब्द ही उसके जीवन की लौ हो। वह स्कूल जाते बच्चो को बड़े गौर से देखा
करता और कई बार तो उनके साथ-साथ चलने लगता। माँ भीमाबाई बालक को गोदी में
उठाये घर लाती।
भीमराव जब छह वर्ष के हुए तो उनके सतारा के कैण्ट स्कूल में भर्ती कराया गया।
उनका उपनाम अम्बावडेकर था। अम्बेडकर से अम्बेडकर कैसे पड़ा—इसके बारे में
आगे उन्होंने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किये थे–“अम्बेडकर नाम के एक
ब्राह्मण मास्टर हमें पढ़ाते थे। वे हमें कुछ ज्यादा पढ़ाते नहीं थे। लेकिन उनका मुझसे बहुत
प्रेम था। बीच की छुट्टी में खाने के लिए मुझे स्कूल से दूर अपने घर जाना पड़ता था।
छुआछूत की वजह से वह अपनी साग रोटी दूर से मेरे हाथों में डालते थे। मुझे यह कहने में
दी अभिमान मालूम होता है कि उस प्रेम के साग रोटी का मिठास कुछ और ही था। एक दिन
उन्होंने मुझसे कि यह तेरा अम्बावडेकर नाम बोलने में अटपटा है। उससे मेरा उपनाम अम्बेडकर
बोलने में साफ स्पष्ट है। अब आगे तू भी अम्बेडकर उपनाम लगाया कर और उन्होंने रजिस्टर में वैसा ही दर्ज कर दिया। विद्यालयी परिवेश भी छुआछूत से अछूता नहीं था। दूसरे छात्र कमरों में डेस्कों पर बैठकर पढ़ते थे। भीम और उसके आनन्दराव को बाहर बरामदे में बैठकर पढ़ना पड़ता था। यह वह जगह थी जहाँ पर दूसरे छात्र अपने जूते निकालते थे। उन्होंने इस
लार से कहा ।उन्होंने इस स्कूल में अनेक कठिनायों का सामना किया पर इन्हीं विपरीत परिस्थितियों में बालक अम्बेडकर 1902 में प्राइमरी शिक्षा प्राप्त की। तथा शल्फिटन स्कूल से उन्होंने सन् 1907 में मैट्रिक की परीक्षा उर्तीण की। तथा उनका विवाह मातृपितृ विहीन कन्या रमाबाई के साथ हुआ। उस
समय रमाबाई की उम्र 9 वर्ष थी वह सुन्दर तथा सरल स्वभाव की अबोध बालिका थी।इसके बाद 1912 में भीमराव ने तृतीय श्रेणी में बी.ए. पास किया। तथा इसके
बाद 2 फरवरी1913 का वह मनहूस दिन था। भीमाबाई तो उनको छह वर्ष का छोड़कर ही
चल बसी थी। इसके बाद में उच्च शिक्षा के लिए वे अमेरिका गये।
वहाँ जाकर कोलम्बिया विश्वविद्यालय में प्रवेश किया। अर्थशास्त्र प्रमुख विषय तथा
समाजशासन राज्यशास्त्र मानवदंश
शास्त्र तत्वज्ञान सहायक विषय लेकर एम.ए. करने में जुट
गये। 1915 में उन्होंने एम.ए. की उपाधि प्राप्त की।
1916 में पी.-एच.डी. की उपाधि प्रदान की गई।
समाज सुधारक
छुआछूत के जिन शोलों ने भीम को झुलझाया था वे घाव आज तक मेंठीक नहीं हुए । होते भी कैसे !भला बिना मवाद निकले फोड़ा ठीक हुआ है ?वे कोलाम्बिया
विश्वविद्यालय से एमए. पी.एच.डी. तथा लन्दन विश्वविद्यालय से एमएस. सी. डीएससी.
तथा बार एट लॉ जैसी डिग्रियाँ प्राप्त की । उस समय भारत के वे अकेले ऐसे उभरे विद्वान थे।
जिनके पास इतनी डिग्रियाँ थी। कुछ समय पश्चात वे गाँधी के पास गये तथा गाँधीजी से
छुआछूत के बारे में चर्चा की तथा गाँधीजी भी इस वर्ग को जड़ मूल से मिटाना चाहते थे।
ताकि जाति-पांति व छुआछूत स्वत: ही समाप्त हो जाये।
अपने आन्दोलन को जन जन तक पहुँचाने के लिये उन्होंने प्रिंट मीडिया को उचित
माध्यम माना डॉ. अम्बेडकर ने 29 जुलाई, 1927 को अपने बहिष्कृत भारत" नामक
पाक्षिक में लिखा था, यदि लोकमान्य तिलक अछूती में पैदा हुए होते तो वह स्वराज्य मेराजन्म सिद्ध अधिकार है यह आवाज बुलन्द न करते बल्कि उनका सर्वप्रथम नारा होता "अछूतपन
का नाश करना मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है।'
अछूत समाज के प्रति यह उनकी सच्ची सच्ची हमदर्दी थी।
अछूती द्वार आन्दोलन को नई दिशा देने के लिए उन्होंने 20 जुलाई, 1924 को बम्बई।
में ‘‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा" की स्थापना की इसके बाद 19 मार्च1927 को डॉ.
अम्बेडकर की अध्यक्षता में ही दलित जाति परिषद का अधिवेशन हुआ।
12 नवम्बर, 1930 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनाल्ड की अध्यक्षता में प्रथम
गोलमेज कॉन्फ्रेंस प्रारम्भ हुई। इसमें भारत की तरफ से दलितों के प्रतिनिधि के रूप में डॉ.
अम्बेडकर और राव बहादुर श्री निवास को आमंत्रित किया गया था। तथा 7 सितम्बर,
1931 को दूसरी गोलमेज कॉन्फ्रेंस की बैठक हुई।
संघ शासन का ढाँचा कमेटी' में संघ शासन का ढांचा तैयार करने का काम डॉ.
अम्बेडकर को सुपुर्द कर दिया।
दूसरी गोलमेज कॉन्फ्रेंस की बैठक 7 सितम्बर को फिर शुरु होकर 1 दिसम्बर1931
को समाप्त को गई परंतु आपस में कोई समझौता न हो सका। तथा इसके बाद 15 अगस्त
1947 को भारत संघ अंग्रेज शासन से मुक्त हुआ स्वतन्त्र देश की शासन प्रणाली को चलानेहेतु उसका लिखित या मौखिक संविधान होना
अपरिहार्य है। 11 दिसम्बर, 1946 के दिन डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थाई
अध्यक्ष चुना गया।24 अगस्त, 1947 को एक सात सदस्यीय संविधान प्रारूप समिति बनाई गई। डॉ.
बी.आरअम्बेडकर को उसका अध्यक्ष बनाया गया। तथा इसके बाद संविधान निर्माण का पूरा काम डॉ. अम्बे डकर के कर कमलों द्वारा ही सम्पन्न हुआ। प्रारूप समिति के अध्यक्ष डा.
,अम्बेडकर ने संविधान का यह प्रारूप संविधानसभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद व प्रधानमंत्री पंडित नेहरु को सौप दिया।
26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने नवनिर्मित संविधान को स्वीकृत एवं अंगीकार
किया। इस बीच इसमें 7638 संशोधन हुए और 26 जनवरी1950 को इसे लागू किया। संविधान बनाने में कुल 2 वर्ष 11 माह 18 दिन लगे। बाबा साहब डॉ. भीमरावअम्बेडकर समाजशास्त्र, अर्थशास, राजशास्त्र, धर्मशास्त्र ,मानवशास्त्र, भाषाशास्त्र , नीतिशास्त्र,
विधानशास्त्र तत्व ज्ञान धर्म, कानून व इतिहास के प्रकाण्ड विद्वान थे। तथा वस्तुत: वे विश्व की महान विभूति थे।
उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी जिसमें सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक शुद्र कौन थे शुद्र कौनऔर कैसे हैं तथा भारत में जातिवाद आदि पुस्तकें लिखी थी।
अन्तिम यात्रा
5 दिसम्बर, 1956 की रात 1956 की रात को उन्होंने इस ग्रन्थ की भूमिका लिखकरउसे पूर्ण किया और भोजन करके प्रसन्नचित सो गये।
