महावीर स्वामी Mahaveer Swami

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 महावीर स्वामी  Mahaveer Swami

वर्धमान महावीर

                                                           पुरुषार्थ के बिना भाग्य का निर्माण नहीं हो सकता।

                                                   महावीर स्वामी

    जन्म और बचपन

ऐसे समय में आम जनता इस प्रतीक्षा में थी कि भारत के क्षितिज पर कोई ऐसा सूर्य उदय  हो जो अपने चारों ओर फैले अंधकार के आवरण को चीर कर तो निकले ही समाज में
फैले पाखंड व , आडम्बर और अज्ञान के अंधकार को भी दूर करे तथा उसे एक नये प्रकाश से
जगमगा दे और हुआ भी ऐसा ही।

भारत के बिहार प्रदेश में वैशाली नाम का एक गणराज्य था। उस गणराज्य में क्षत्रीय कूँड' नाम का एक नगर था। यह नगर ज्ञातवंशीय क्षत्रियों का प्रधान केन्द्र था उनकी, एक

छोटी-सी राजधानी थी। यहाँ ज्ञात क्षत्रियों के राजा सिद्धार्थ शासन करते थे। राजा सिद्धार्थ
की रानी थी त्रिशला।
चैत्र का पावन महीना था शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी का दिन था। इन्हीं सिद्धार्थ शासक
के यहाँ त्रिशला रानी की कोख से एक बालक का जन्म हुआ था। माता-पिता ने इस बालक
का नाम रखा–वर्द्धमान आगे चलकर यह बालक वर्द्धमान एक बड़े ही मेघावी, योग्य व
पराक्रमी महापुरुष के रूप में सामने आया। इससे वह जन-जन में महावीर' के नाम से
प्रसिद्ध हो गया और आज हम उस यशस्वी बालक को “वर्द्धमान महावीर'' के नाम से
जानते हैं। वस्तुतः “वर्द्धमान महावीर का जन्म भारतीय क्षितिज पर एक ऐसे ही सूर्य का
उदय था जिसके प्रकाश की किरणों से भारत-भूमि का कोना-कोना जगमगा उठा।
एक लोकोक्ति है-
होनहार बिरवान के होत चीकने पात।।
इसका आशय यह है कि जो बालक होनहार होते हैं, उनके लक्षण पहले ही से
दिखायी देने लगते हैं। बालक वर्द्धमान महावीर के सम्बन्ध में भी यही बात चरितार्थ होती।


थी। वे बड़े ही होनहार बालक थे। उनमें अपार मेधा-शक्ति थी और अदम्य सा
की चीज तो उन्हें छू तक नहीं गयी थी उनकी इन विशेषताओं की अनेक कहानिया
साहित्य में मिलती हैं। उनमें से कुछ का उल्लेख कर देना यहाँ सार्थक  ही होगा।
उस समय क्षत्रिय कुंड के किसी विद्वान ब्राह्मण का एक गुरुकल था।
उस गुरुकुल में राजाओं, सेनापतियों तथा राजपुरोहितों के पुत्र दूर-दूर से विधाध्ययन करने आते थे ।
गुरुकुल का छात्र होना बड़े गौरव की बात मानी जाती थी। बालक वर्द्धमान की
समय आठ वर्ष की थी। उन्होंने इस गुरुकुल में अपनी विलक्षण प्रतिभा से अपने आचार्य को
चकित कर दिया था। इस पर आचार्य के मुँह से सहसा निकल पड़ा था-“यह शिशु नहीं।
साक्षात् सरस्वती है। इस कोई क्या ज्ञान देगा? सूर्य को पथ दिखाने के लिए क्या कहीं दीपक
जलाये जाते हैं?

एक दूसरी कहानी एक बार की बात है। बालक महावीर अन्य बालकों के साथ नगर

के बाहर एक वन में खेल रहे थे। सहसा, एक वृक्ष के नीचे एक भीमकाय अजगर जैसा सर्प
फुफकारता हुआ दिखायी दिया सारे बच्चे भय के मारे काँपने लगे, भागने लगे, किन्तु बालक
महावीर तो महावीर क्या प्रातः कालीन बालरवि अपने चारों ओर के गहन अंधकार से कभी
डरा है। बालक महावीर तुरन्त दौड़ कर उस महाकाय सर्प के पास गये। उन्होंने उसे देखा और
मुस्कराये। बोले-“नागराज' यहाँ इस खेल के मैदान में तुम्हारा क्या काम? और हंसते ।
मुस्कराते हुए उन्होंने उस मुहाकाय सर्प को उठा लिया तथा खेल के मैदान से दूर झाड़ी में ।
डाल आये।
बालक वर्द्धमान के दृढ़ संकल्पी मन की एक लघुकथा भी उल्लेखनीय है। एक दिन की
बात है। बालक वर्द्धमान एक शेर के लिए मचल पड़े जब उनके मन को नहीं हुई तो वे ।
राजमहल में कहीं इधर छिपते कहीं उधर कहीं गली गलियारों में भाग जाते अगर पकड़ में ।
आ जाते तो कहते माँ से कह दो, मुझे पक्षी नहीं शेर चाहिए। जब शेर ला दोगे तो में माँ के ।
पास जाऊँगा।।
एक दिन उनकी माता त्रिशला ने शेर का खिलौना लाकर उन्हें दे दिया। बालक
वर्द्धमान उनकी गोद में लिपट गया। लेकिन एक बार एक सेविका ने मन को चिढ़ाने के
लिए हाथी का खिलौना दिखाते हुए कहा, कुमार तुम्हारा सिंह तो नकटा है उसके हाथी जैसी
नाक तो है ही नहीं। वर्द्धमान तुरंत  माँ के पास गये। माँ ने बहुत समझाया। पर वे नहीं माने।
माता-पिता के धमकाने से वे और अधिक मचल पड़े।
इस पर राजा सिद्धार्थ ने अपने मन्त्री को बुलाया। मन्त्री ने सारी बात समझकर राजा से
निवेदन किया महाराजा वालक को डाटिये मत। किसी कुशल शिल्पी से एक नाकदार सिंह
का खिलौना बनवाकर उसे दे दिया जाय तो बालक का हठ  समाप्त हो जाएगा और थोड़ी ही
देर में मन्त्री जी एक नाकदार शेर का खिलौना बनवाकर ले आये। वह उन्होंने बालक वर्द्धमान
को दे दिया। बालक का मन प्रसन्न हो गया। उसने उस चिदाने वाली सेविका  को वह
खिलौना दिखाते हुए कहा-देखो, अब तो मेरा सिह नकटा नहीं है।'' उस सेविका ने
बालक वर्द्धमान के दृढ़ संकल्पी मन की सराहना की। वस्तुतः वर्धमान को मनचाहा खिलौना
मिलने की तो खुशी थी ही, उससे भी अधिक उसे अपना संकल्प पूरा हो जाने की प्रसन्नता
थी।

पारिवारिक जीवन-

जैन धर्म के अनुयायियों की दी प्रमुख शाखाएँ हैं—(1) दिगम्बर, (2) श्वेतावर।

दिगम्बर वह शाखा है जिसके साधु वस्त्रों का त्याग कर देते हैं। श्वेताम्बर वह शाखा हैं
जिसके साधु श्वेताम्बर अर्थात् सफेद वस्त्र धारण करते हैं। दिगम्बर शाखा के अनुयायियों के
अनुसार महावीर ब्रह्मचारी ही रहे पर श्वेताम्बरों के अनुसार उनका विवाह राजा समरवीर
की पुत्री यशोदा' के साथ हुआ। महावीर का गृहस्थ जीवन बड़े आनन्द और सुख से
बीता। सांसारिक सुख सुविधाओं की उन्हें कोई कमी नहीं भी नहीं थी। परन्तु सांसारिक सुखों
में उनका बाल्यवास्था से ही कोई लगाव नहीं था। वे तो घटों सांसारिक दुखों के कारणों तथा
उनके निवारण के उपायों पर सोचते रहते थे।
विश्व परिवार की ओर
महावीर की अवस्था अट्ठारह वर्ष के करीब थी कि उनके माता-पिता का देहान्त हो
गया। उनके समस्त परिवार ने राजसिंहासन के लिए उनसे अपनी और प्रजा की और से बड़ा
आग्रह किया, पर उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। वे इस निर्णय पर पहुंच चुके थे। कि भारत
में जो सामाजिक और धार्मिक अव्यवस्था है, उसके सुधार के लिए परिवार की सीमाओं को
लाँघकर एक विश्व परिवार का आदर्श सामने रखकर काम करना होगा। अपने इस निर्णय के
अनुसार राज्य वैभव को त्यागकर पीड़ित मानवता की सुख शान्ति के लिए वे तीस वर्ष की
अवस्था में ही वीराग भिक्षु बन कर निकल पड़े।

साधना के पथ पर-

ज्यों ही भगवान महावीर ने अपने लक्ष्य सिद्धि के लिए साधना के पथ पर पैर रखे त्यो
ही सबसे पहले उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक मुझे 'केवल्य' अर्थात् 'पूर्ण बोध' प्राप्त नहीं
हो जायगा मैं सामूहिक जन-सम्पर्क से अलग रहूंगा। उनका दृढमत था कि जब तक मनुष्य
अपने जीवन को नहीं सुधार लेता तब तक वह दूसरों के जीवन को नहीं सुधार सकता। अनेक
प्रकार के कष्टों को सहते हुए महावीर की वह साधना बारह वर्षों तक अबाध गति से चलती
रही। साधना के तेरहवें वर्ष में उन्हें कैवल्य अर्थात् 'पूर्ण बोध की प्राप्ति हुई। वे 'नर' से
'नारायण' तथा 'आत्मा से ‘परमात्मा बने। वे अब 'अर्हन्त (योग्यतम) 'जिन' (इन्द्रियों को
जीतने वाले) तथा तीर्थकर (उपास्यदेव) कहलाये।

सिद्धान्त सार--

कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात महावीर लोक मंगल की भावना से घूम-घूम कर धर्म
का प्रचार करने लगे। उन्होंने उस समय के समाज में फैली रूढियो, अज्ञानताओं, अंधविश्वास
आदि के विरोध में शंखनाद किया। यज्ञ में मूक पशुओं की बलि दी जाने के सम्मबंध
में उन्होंने उद्घोष किया कि अगर हम किसी को जीवन नहीं दे सकते तो उसे मारने का
क्या अधिकार है ? जाति-पाँति के भेद भावों पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि कोई इन
जन्म से ऊँचा या नीचा नहीं होता। आदमी आदमी सबै बराबर है। उन्होंने नारियों की
स्वतन्त्रता पर भी बड़ा बल दिया। उन्होंने यह बात भी जोर देकर कही कि जनसेवा' ही
सच्ची सेवा है। उन्होंने अपने निम्नांकित सिद्धान्त भी जन जन के सामने रखे।
(1) आत्मा जैसा कार्य करती है उसे वैसा ही फल मिलता है।
(2) प्रत्येक वस्तु पदार्थ या स्थिति को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखना, परखना और समझना
चाहिए, केवल एक दृष्टिकोण से नहीं उनके इस सिद्धान्त को 'अनेकान्तवाद' या
'स्वादवाद कहा गया।'
(3) संसार में विचार और चिंतन के जितने भी तरीके हैं, उन सबके समन्वय से ही कार्य में
सफलता मिलती है। हमें किसी एक दृष्टिकोण पर ही आग्रह नहीं करना चाहिए।

उपदेशामृत-

भगवान महावीर ने जिन पाँच व्रतों के पालन का उपदेश दिया वे इस प्रकार है-

(1) अहिंसा-'अहिंसा परमोधर्मः। अर्थात् अहिंसा ही परमधर्म है।

अहिंसा का अर्थ है—प्रेम, करूणा, दया, सेवा सहयोग, जीओ और जीने दो का

आदर्श आदि। इसका तात्पर्य है मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाना।

(2) सत्य–मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन करना।

(3) अस्तेय–किसी भी प्रकार की चोरी न करना। किसी भी वस्तु को बिना उसके

स्वामी की अनुमति के न लेना।

(4) अपरिग्रह–किसी भी वस्तु का आवश्यकता से अधिक मात्रा में संग्रह न करना।  ब्रह्मचर्य-सभी प्रकार की वासनाओं को त्यागकर संयम का जीवन बिताना।।

निर्वाण-प्राप्ति

क्या गरीब, क्या अमीर, क्या सामान्य जन, क्या विशिष्ट जन, सभी पर भगवान

महावीर के उपदेशों का बड़ा गहरा असर पड़ा। धर्म का निरन्तर प्रचार करते हुए आधुनिक

बिहार राज्य में पावापुरी नामक स्थान पर उनका निर्वाणि हुआ। निर्वाण के समय उनकी आयु

72 वर्ष की थी।

यद्यपि भारत के क्षितिज पर उदित हुआ वह देदीप्यमान सूर्य अस्त हो गया, तथापि

प्रकाश की किरणों से आज भी संसार आलोकित हो रहा है।



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