काली मिर्च (Piper Nigrum)
परिचय व पहचान:
काली मिर्च, मसालों में एक जाना पहचाना नाम है। संस्कृत
में इसे रुधिर, पवित, यवनप्रिय, वल्लिज, कटुक वृतफल इत्यादि कहते हैं। यह लता
रूपी पौधा है, जो भारतवर्ष में कर्नाटक, केरला, तमिलनाडु आदि दक्षिण भारतीय
क्षेत्रों में पैदा किया जाता है। इस क्षेत्र के किसान इसकी लता के छोटे-छोटे टकरे
करके बड़े वृक्षों की जड़ लगा देते हैं। फिर यह उन वृक्षों के सहारे उस पर फैलती
जाती है। इस लता के पत्ते नागर बेल के पत्ते की तरह, मगर उससे बहुत छोटे होते हैं।
इसके फल बेल लगाने के तीन वर्ष बाद आते हैं। फल गुच्छों के आकार में लगते हैं।
जो कच्चे हरे, पकने पर लाल और सूखने पर काले हो जाते हैं।
गुण-धर्म:
काली मिर्च तीखी, चरपरी तथा स्वभाव से गरम व व्यवहार में वात-
कफ नाशक, दमा, शूल तथा पेट के कीड़ों को नष्ट करने वाली होती है। दांतों की
पीड़ा, यकृत और पेशियों के दर्द में, तिल्ली की बीमारी, जीर्ण ज्वर, पक्षाघात तथा
मासिक धर्म में लाभप्रद होती है।
औषधीय उपयोग:
1 काली मिर्च पांच दाने, सत्यनाशी के बीज 6 माशे-इन
दोनों को पीसकर तीन दिन तक खिलाने से पागल कुत्ते के जहर में लाभ पहुंचाता है,
मगर खटाई और तेल से साल भर तक परहेज करना चाहिए।
2 काली मिर्च को पीसकर
दही और पुराने गुड़ के साथ देने से नाक से गिरने वाला खून बन्द हो जाता है।
3 काली
मिर्च को दही के साथ घिसकर आंखों में काजल की तरह लगाने से रतौंधी मिट जाती
है।
4 काली मिर्च को घी में पीसकर नाक में टपकाने से आधाशीशी में लाभ होता है।
5 काली मिर्च को शहद के साथ चटाने से सर्दी से होने वाली खांसी, दमा और सीने
का दर्द मिटता है तथा कफ बाहर निकल आता है।
6 काली मिर्च को पोस्त दानों के
साथ जोश देकर कुल्ला करने से दांतों का दर्द मिटता है।
7 काली मिर्च दो माशे, जीरा।
एक माशा, शहद डेढ तोला-इन सबको मिलाकर एक चाय के चम्मच के बराबर
खुराक देने से बवासीर में लाभ होता है।
8 काली मिर्च एक रत्ती, हींग आधी रत्ती
और अफीम पाव रत्ती-इन तीनों को मिलाकर देने से अतिसार में लाभ होता है।
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