भारतीय समाज सुधारक sati pratha
राजा राम मोहन राय (Raja Ram mohan Rai)
जन्म और बचपन(birth and Childhood )
राजा राममोहन राय का जन्म 1774 ई. में बंगाल के राधानगर गाँव में एक ब्राह्मणपरिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम रामकांत राय और माता का नाम तारिणी देवी था।
बालक राममोहन की स्मरण शक्ति असाधारण थी। वे किसी भी सुने हुए वाक्य को ठीक
वैसा ही याद रख सकते थे। उनकी शिक्षा दीक्षा घर पर ही हुई। अपनी मातृभाषा बंगला के
अतिरिक्त उन्होंने छोटी उम्र में ही अरबी और फारसी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। 12
वर्ष की उम्र में संस्कृत का अध्ययन करने के लिए वे वाराणसी गये। वहाँ उन्होंने वेदांत और
उपनिषदों का गहन अध्ययन किया। इस अध्ययन से वे इस परिणाम पर पहुँचे कि केवल ब्रह्म
ही एक मात्र सत्य है और उसी की उपासना करनी चाहिए
घर लौटकर 16 वर्ष के राममोहन राय अपने विचार खुलकर प्रकट करने लगे। उन्होंने
मूर्ति पूजा आदि को अनावश्यक बताया। इससे तत्कालीन समाज में उनका बड़ा विरोध
हुआ। इससे घबरा कर उनके माता-पिता ने भी राममोहन राय को घर से निकाल दिया। घरसे निकालने के बाद इतनी उम्र में ही वे बंगाल से चलकर तिब्बत जा पहुँचे। परन्तु वहाँ धर्म
का जो रूप था । उसमें भी उन्हें दोष ही नजर आये परिणामस्वरूप तिब्ब्त में भी उन्हें घोर
विरोध का सामना करना पड़ा। यदि कुछ दयालु महिलाओं ने बचाया न होता तो वहाँ के
लोग उन्हें मार डालने की तैयारी कर चुके थे।
छोटी उम्र में ही उन्होंने पर्याप्त ज्ञान प्राप्त लिया था। वे निर्गुण ब्रह्म या एकेश्वरवाद
का समर्थन करते थे और शास्त्रों के आधार पर मूर्ति पूजा को अनावश्यक बताते थे। उनके
अनुसार ब्रह्मवाद में पैगंबरों का कोई स्थान न था। पंडित और मुल्ला समाज उनका विरोध तो
करता था, किन्तु उनके अकाट्य प्रमाणों का उत्तर किसी के पास नहीं था ? फिर बने हुए
नास्तिक और धर्म विरोधी कह कर बदनाम किया गया।
सती प्रथा का विरोध
जब राममोहन राय सती प्रथा के विरोध में प्रचार लगे करने तब तो उनके विरोधियों कीसंख्या और भी बढ़ गयी। तिब्बत से लौटने पर वे अपने गाँव में रहने लगे थेविरोध हैं।
नपी ऑधी को देखकर पिता ने फिर उन्हें घर से निकाल दिया। बात यही तक नहीं।
पिता की मृत्यु के बाद माँ की और से उन पर मुकदमा चलवाया गया। उन्हें धर्म से भार
घोषित करके पिता की सम्पत्ति के अधिकार से वंचित करने की माँग की गयी । मुकदमा गलत
था जीत राममोहन राम की हुई। पर जीत के बाद उन्होंने सारी सम्पत्ति अपनी माँ को ही दे दी।
समाज की बुरी और अनावश्यक प्रथाओं के विरोध में आवाज उठाने इसी प्रकार
वालों को
संकटों का सामना करना पड़ता है।
संस्कृत अरबी और फारसी का पूरा ज्ञान प्राप्त करने के बाद राममोहन राय ने 22 वर्ष
की उम्र में अंग्रेजी पढ़ना आरम्भ किया और शीघ्र ही इसमें भी पारंगत हो गये। उन्होंने
अनुभव से देखा कि जो व्यक्ति सरकारी पद पर है लोग उसका सम्मान करते हैं, विरोध नहीं
करते। अतउन्होंने भी ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक पद प्राप्त कर लिया। 14 वर्ष तक वे इस
पद पर काम करते रहे। परन्तु समाज सेवा के लिए कम समय मिलने के कारण बाद में उन्होंने
यह पद छोड़ दिया।
अब तो वे अपना पूरा समय समाज सेवा में देने लगे। वे गाँव से कलकत्ता आ गये
उन्होंने बंगला और अंग्रेजी में वेदांत और उपनिषद ग्रन्थों का अनुवाद किया।
धार्मिक ढ़कोसलों के खंडन में अनेक पुस्तकें लिखी। उन्हें आधुनिक बंगला गढ़
साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। फारसी भाषा में भी उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण ग्रंथों की
रचना की।
ब्रह्मसमाज की स्थापना
समाज सुधार के क्षेत्र में राममोहन राय का सबसे बड़ा योगदान ब्रह्मसमाज" कीस्थापना है। इस समाज का आरम्भ उन्होंने 1828 ई. में किया। इसमें संप्रदाय के आधार पर
किसी प्रकार का भेदभाव नहीं माना जाता था। ईश्वर एक है इस बात का प्रचार किया जाता।
सामाजिक सुधार जैसे जाति-पांति का उन्मूलन अंतर्जातीय विवाह, विधवाविवाह, महिलाओं
का उत्थान, सतीप्रथा का विरोधबहुविवाह का विरोध आदि ब्रह्म-समाज के मुख्य कार्य
राममोहन राय के उन प्रयत्नों से लोगों का ध्यान इन सामाजिक कुरीतियों की और
गया और समाज में नयी जागृति आयी। उनके प्रयत्न से सरकार ने भी कानून बनाकर सती
प्रथा पर रोक लगा दी।
जामोहन राय स्वतंत्रता के प्रेमी थे। उनका मानना था कि जाति, धर्म या क्षेत्र के
आधार पर किसी पर प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए। देश में नये सिरे से राजनीतिक चेतना पैदा कर
संवैधानिक तरीकों से राजनीतिक आंदोलन चलाने का ।
के ऐसे कदमों के विरोध में भी वे आवाज उठाते रहे जो उनकी दृष्टि में
करने का श्रेय भी उनका है। उन्होंने
बताया सरकार
जनता के लिए अहितकर थे।
राममोहन राय ने प्राचीन भारतीय साहित्य का गहन अध्ययन किया था। वे चाहते थे
कि लोग अपनी संस्कृति के असली रूप को भली भांति समझे। साथ ही वे अनुभव करते थे।
कि हमें अपनी बुद्धि के दरवाजे बंद नहीं रखने चाहिए। पश्चिम की भाषाओं का ज्ञान और
विज्ञान की जानकारी भी देश की उन्नति के लिए आवश्यक मानते थे।
लंदन प्रवास
राममोहन राय का नाम चारों और फैल गया था। उस समय तक भारत पर ईस्ट इंडियाकम्पनी का कब्जा लगभग पूरा हो चुका था। दिल्ली का मुगल बादशाह अकबर (द्वितीय)
ईस्ट इंडिया कंपनी की कृपा के सहारे नाम मात्र का बादशाह था। उसने कम्पनी के साथ
अपने झगड़े के सिलसिले में विलायत भेजने के लिए राममोहन राय को तैयार किया उन्हें
'राजा' की उपाधि दी और वे ‘‘राजा राममोहन" के रूप में 1830 ई. में लंदन गये।
जीवन के अंतिम दिन
लंदन में राजाराममोहन राय ने बादशाह का पक्ष तो प्रस्तुत किया ही, उन्होंने पश्चिमको नये विकसित हो रहे भारत का परिचय दिया। उनके लेखों और भाषणों से वहाँ के विद्वानों
की भारत की संस्कृति और प्राचीन सभ्यता की जानकारी मिली। इस काम के लिए विलायत
जाने वाले वे पहले भारतीय थे। इंग्लैंड से वे कुछ समय के लिए फ्राँस भी गये। वहाँ भी
उन्होंने विद्वानों के सामने भारत के सम्बन्ध में अनेक भाषण दिये। फ्रांस से लौटने के बाद वे
इंग्लैंड के ब्रिस्टल नगर से रह रहे थे। वहीं पर 27 सितम्बर 1833 . को उनका देहांत हो
गया। राजा राममोहन राम के निधन से एक महान समाज सुधारक उठ गया। किन्तु अनेक
बाधाओं का सामना करते हुए तथा कष्ट उठाते हुए उन्होंने जो कार्य किये उनका पूरापूरा
लाभ देश को आने वाले समय में मिला।
