चाय (CanciaThitor)
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| चाय (CanciaThitor) |
परिचय पहचान
चाय को संस्कृत में चाविका, चाह इत्यादि कहते है। आज भारत चाय एक जाना पहचाना
नाम है इसकी सूखी पत्तियां बाज़ार में पैक तथा
खुली बिकती हैं। यह मशहूर है और कई प्रकार
की होती है। चाय को भारतवर्ष में लोग पन्द्रहवी
सदी से जानते हैं। पहले यह सामान्य व्यवहार
में नहीं थी। चाय को एक पेय के रूप में तथा
इसकी विधिवत खेती करने का श्रेय इस्ट
इड़िया कम्पनी को जाता हैं। इससे पहले
पहाड़ी प्रदेश के आदिवासी इसको उबालकर
स्फूर्ति तथा थकान मिटाने के लिए प्रयोग करते हैं
चाय
हलका व अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। खेती व अधिक उपज की दृष्टि
थे। यह एक झाड़ीनुमा पौधा होता है, जो पहाड़ी
से इसको समय समय पर कलम किया जाता है। जिससे यह पौधा 5-6 फुट से ऊपर
नहीं बढ़ने पाता है। इसकी पत्तियां घनी और मौसम तथा वातावरण के अनुकूल भिन्न-
भिन्न आकार की होती हैं। अधिकतर इसकी पत्तियां ही प्रयोग में लायी जाती हैं।
| गुण-धर्म: चाय स्वाद में चरपरी, तीखी तथा दूसरे दर्जे में गरम और खुश्क है।
चाय पीने से मस्तिष्क को उत्तेजना मिलती है और तबीअत में प्रसन्नता पैदा होती है।
चाय पेशाब और पसीना लाती है, सिरदर्द और मैदे की जलन को दूर करती है। यह
हल्की कफ, पित्तनाशक और वात को कुपित करने वाली होती है।
औषधीय उपयोग:
चाय को जोश देकर लेप करने से सख्त सूजन बिखर
जाती है।
* बनफसा, हंसराज, मुलहठी, गुलखतमी, अकरकरा और सनाय के साथ
जोश देकर, इस जोशान्दे में नमक, कच्ची शक्कर और गुलाब का तेल मिलाकर चाय
का ऐनिमा लेने से आतों को सब गन्दगी दस्त की राह से निकल जाती है।
चाय को
हरड़, बहेड़ा, आँवला और रेवन्द चीनी के साथ जोश देकर पीने से पित्त और कफ को
जमावर निकल जाती है। में चाय को बनफसा और मुलहठी के साथ पीने से जुकाम
और नजले में लाभ होता है।
चाय को पुदीना और अकरकरे के फूल के साथ पीने
से वायु से पैदा उदरशूल मिट जाता है।
* चाय को सालम मिश्री, दालचीनी, अम्बर
व दूध के साथ पीने से कामशक्ति बढ़ती है।
* केशर के साथ चाय पीने से प्रसूति
कष्ट मिटकर बच्ची आसानी से पैदा हो जाता है।
नोट-गरम प्रकृति वालों को खाली पेट चाय पीने से मुंह में खुजली, खुश्की, दमा
और अग्निमांघ पैदा होती हैं। इसका दर्प मिटाने के लिए गरम मिजाज वालों
के लिए बकरी का दूध और सुपारी तथा सर्द मिजाज वालों के लिए कस्तूरी,
सोंठ व दालचीनी का प्रयोग उत्तम रहता है
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