Ayurvedic: खस (Andropogan Muricatus)

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 खस (Andropogan Muricatus)

 


 खस (Andropogan Muricatus)

 

 

 

परिचय व पहचान:

 खस को हिन्दी में वाला, वेना, ओनई, पानि तथा संस्कृत

में दादहरण, हरिप्रिया, जलाशय, शीतमूलका, शिशिरा इत्यादि कहते हैं। ये एक सुगन्धित

घास है, जो भारत के अनेक जगहों पर पायी जाती है। यह गांडर घास की जड़ है, जो

सदा कायम रहने वाली है। इसकी जड़े भूमि में बहुत गहरी होती हैं, जो बहुत बारीक

होती हैं। इन जड़ों से एक प्रकार की सुगन्ध आती है। अपनी इस सुगन्ध के कारण यह

वनस्पति मशहूर है। औषधि प्रयोग में इसकी जड़ ही प्रयोग की जाती है। इसकी जड़

का तेल तथा आसवन विधि से इसका इत्र भी निकाला जाता है।

गुण-धर्म

: खस की जड़ रंग में भूरी, स्वाद में चरपरी, कड़वी तथा फीकी-सी

होती है। स्वभाव में शीतल होती है। इस सुगन्धित वनस्पति में दाह, पित्तज्वर व थकान

दर करने के गुण होते हैं। यह अनैच्छिक वीर्यस्त्राव,मस्तक पीड़ा, रक्त सम्बन्धी शिकायतों,

कफ, पित्त, तृषा, विसर्प आदि रोगों में लाभदायक होती है।

औषधीय उपयोग:

 इसके रस में बूरा मिलाकर पिलाने से गरमी से होने वाले

उन्माद में लाभ पहुंचता है।

 * खस और पीपरामूल को बराबर लेकर घी से चाटने से

 

 

 

तीव्र हृदय शूल मिटता है।

 * खस को लोभान के साथ चिलम में रखकर पीने से

मस्तक पीड़ा मिटती है।

 * इसके इत्र की दो बूंदे पुदीने के अर्क में डालकर पित्त की

शिकायतों को दूर करने के लिए दी जाती हैं।

 * यह उत्तेजक और ज्वर को उतारने

वाला माना जाता है। इसकी जड़ का क्वाथ बनाकर पिलाने से पसीना आकर ज्वर उतर

जाता है। 

* सोंठ के साथ इसकी फंक्की देने से पैरों की ऐंठन और कम्पन मिटती है।

* इसके चूर्ण को मिश्री के साथ मिलाकर देने से पेशाब की वृद्धि होती है।

 

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