दालचीनी (CinamomumZyeylanicum)
परिचय व पहचान :
दालचीनी को हिन्दी में दारचीनी, कलमी दारचीनी ।
किरका आदि कहते हैं। यह वनस्पति हिमाचल की निचली पहाड़ियों, दक्षिणी वन
क्षेत्रों में पायी जाती है। यह मध्यम श्रेणी का सदा हरा रहने वाला वृक्ष है। इसकी छाल
कुछ मोटी, चिकनी, लाली लिये हुए भूरी व कुछ फीके रंग की होती है। इसके पत्ते
7 से 15 सें.मी. तक लम्बे होते हैं, जो लम्बगोल और बरछी के आकार के होते हैं।
इसका फल सवा से पौने दो सें.मी. तक लम्बा होता है, जो करौंदे के समान होता है।
जिनसे तेल निकलता है। इसका फूल गुलाब के समान महकता है। इसके फूलों का
इत्र बनाया जाता है। इसके पत्तों को सुखाने से लौंग के समान सुगन्ध आती है। दालचीनी
के नाम से बाजार में भिन्न-भिन्न वृक्षों की छाल बिकती है।
गुण-धर्म :
इसकी छाल कड़वी, तीखी, चरपरी, मीठी व सुगन्धित होती है।
स्वभाव से दालचीनी गरम होती है। यह पौष्टिक, वात, पित्त, प्यास, कामोद्दीपक,
कृमिनाशक, अतिसार, खुजली और हृदय तथा गुदाद्वार की बीमारियों में लाभदायक
है। इसका तेल रक्तस्रावरोधक, वमन, दस्त और पेट के आफरे को दूर करने वाला
होता है।
औषधीय उपयोग :
इसकी औषधीय मात्रा तीन माशे से छ: माशे तक है तथा
इसके तेल की मात्रा 5 बंद है। इसका अधिक सेवन करने से मसाने को नकसान
होता है तथा शरीर में गरमी बढ़ती है। इसके दर्प को कम करने के लिए मस्तगी,
कतीरा, सफेद चन्दन, खमीरा व वनफशा दिया जाता है।
* सोंठ 5 रत्ती, दालचीनी
5 रत्ती और इलायची 5 रत्ती-इन तीनों को पीसकर भोजन के पहले लेने से भूख
बढ़ती है और कब्जियत मिटती है। * दालचीनी साढ़े तीन माशे, लौंग 5 रत्ती, सोंठ
15 रत्ती-इन तीनों का एक सेर पानी में काढ़ा बना लेना चाहिए। जब पाव-भर पानी
रह जाये, तब उतारकर छान लेना चाहिए। इस काढ़े को दिन में 3 बार 5 तोले की
मात्रा में देने से इन्फ्ल्यु एंजा में बड़ा लाभ होता है।
* दालचीनी साढ़े तीन माशे, सौंफ
2 माशे, मुलैठी 2 माशे, बीज निकाले हुए मुनक्का दाख 4 माशे, मीठी बादाम का
मगज 1 तोला, कड़वी बादाम का मगज 4 माशे, शक्कर 4 माशे-इन सब चीजों को।
पीसकर तीन-तीन रत्ती की गोलियां बना लेनी चाहिए। इन गोलियों को दिन-भर मुह
में चूसते रहने से खांसी में काफी फायदा होता है और गला साफ रहता है।
* दालचीनी