सदाबहार (Catharanthus Roseus) sadabhar
परिचय व पहचानः
सदाबहार को हिन्दी में सदा सुहागन तथा संस्कृत में।
सद्मपुष्प व नित्यकल्याणी कहते हैं। भारतवर्ष में समुद्र की सतह से 1300 मीटर
तक की ऊंचाई तक के सभी क्षेत्रों में इसे
शोभाकारी पौधे के रूप में घरों और बगीचों
में भी देखा जा सकता है। महाराष्ट्र, गुजरात,
मध्यप्रदेश, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु और
कर्नाटक में इसकी खेती भी की जाती है।
पतझड़ी प्रकृति का पौधा झाड़ीनुमा अनेक
शाखाओं में एक से चार फुट तक ऊंचा होता
है। इसका तना पौधे के आधार पर कम पत्तियों
वाला होता है। इसकी पत्तियों की लम्बाई 4
सें.मी. तथा चौड़ाई डेढ सें.मी. के लगभग
होती है। पत्तियों का ऊपरी हिस्सा गोलाई में अथवा नोकदार होता है। पत्तियों की
ऊपरी सतह चमकदार तथा निचली सतह पीले-हरे रंग की होती है। पत्तियों के आखिरी
क्रम के बीचोबीच में एक या दो फूल लगते हैं, जो गुलाबी या सफ़ेद रंग के होते हैं।
फूल त्रिज्या के समान दो लिंग के पांच पंखुड़ियों वाले होते हैं। पंखुड़ियां आधार पर
एक-दूसरे से हल्की-सी जुड़ी होती हैं। इसकी फलियां 1 से 4 सें.मी. लम्बी रोमिल
होती हैं। बीज अण्डाकार, 1-2 सें.मी. तथा काले रंग के होते हैं। इसकी फलियों में
20-25 बीज पाये जाते हैं।
गुण-धर्म:
सदाबहार स्वाद में चरपरा, कड़वा और तेज़ होता है। स्वभाव से
शीतल होता है। व्यवहार में यह विष दोष, रक्तविकार और पैतिक दोषों का शमन
करता है। जलोदर रोग के लिए यह अत्यन्त लाभदायक है। सुजाक और कान के
दर्द में फायदेमंद है।
औषधीय उपयोग:
* सदाबहार की चार माशा पत्ती को पानी में भिगोकर पीने
से सुजाक में लाभ होता है।
* सदाबहार के पौधे को उच्च रक्तचाप, कैसररोधा,
मधुमेहनाशी, कृमिनाशी विरेचक, प्रतिदंतशूल, प्रतिनिर्जलीकरण, अवसादक, मासिक
धर्म लक्षण प्रतिरोधी, विषहर, ज्वरहर, आर्तवजनक, सुखबोधात्मक आदि गुण
लिए प्रयोग किया जाता है।
* पौधे की पत्तियों के काटे या गरम पानी में निस्सार का
आस्ट्रेलिया, ब्राजील, चीन, आइलैण्डस, दक्षिणी अफ्रीका, जमैका, माक्सका।
पाकिस्तान, पेरु, अमेरिका, ताइवान, वैस्टइंडीज, थाइलैण्ड, यूरोपीय देशो, च,
आदि बहुत से देशों में कैंसर व मधुमेह सहित ऊपर दी गयी अनेक विशेषता
लिए प्रयोग किया जाता है। पौधे के समस्त भागों में समान गुण होने के कारण
किसी एक भाग या सम्पूर्ण पोधे का प्रयोग किया जाता है।
* भारत में सम्पूर्ण पौधे से
प्राप्त गरम पानी के निस्सार को कई प्रकार के कैंसर, खासतौर पर हॉडकिंस बीमारी
में तथा स्त्रियों की मासिक धर्म से सम्बन्धित समस्याओं के लिए प्रयोग किया जाता
है।
* सम्पूर्ण पौधे के प्राकृतिक अवस्था में प्रयोग के अतिरिक्त इसमें पाये जाने वाले
विभिन्न यौगिकों को भी ऐलोपैथिक चिकित्सा पद्धति में अलग-अलग बीमारियों
के लिए प्रयोग किया जाता है। इसमें उपस्थित विनक्रिस्टीन (सल्फेट) को तीव्र
ल्यूकेरिया हॉडकिंस बीमारी, गैर हाँडकिंस लिम्कोमा, लघु कोशिका श्वसनी कैंसर,
ब्रेस्ट कैंसर तथा अनेक सारकोमाओं में प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार इसमें
पाये जाने वाले 100 से अधिक ऐल्केलाइडों में से अनेकों को अलग-अलग प्रकार
की बीमारियों में प्रयोग किया जाता है। इस पौधे का प्रयोग आयुर्वेदिक एवं ऐलापैथिक
दोनों ही चिकित्सा पद्धतियों में बढ़-चढ़कर किया जा रहा है।
* इसके पत्तों के रस
को कान में डालने से कान की पीडा मिट जाती है
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