सनाय/ सोनामुखी (Cassia Angustifolia Vahl)
परिचय व पहचानः
सनाय/सोनामुखीCassia Angustifolia Vahl को संस्कृत में स्वणपत्री, भूमिहारी,
मार्कण्डी कहते हैं। सनाय अथवा सोनामुखी का पौधा मूलरूप से अफ्रीका तथा अरब
देशों का पौधा है। संभवतया यहीं से यह भारत में आया है। यह झाड़ीनुमा पौधा विश्व
के कई भागों में जंगली रूप में पाया जाता है। गुजरात के भुज क्षेत्र, राजस्थान, दक्षिण
भारत के क्षेत्रों में यह प्राकृतिक रूप से पाया
जाता है तथा इसकी खेती भी की जा रही है।
सनाय का पौधा 50 से 9 सें.मी. ऊंचा, झाड़ी-
नुमा, एकवर्षीय होता है, इसकी शाखाएं टेढ़ी-
मेढ़ी फैली होती हैं। इसकी पत्तियां 2 से 5
सें.मी. लम्बी,5 से 15 मि.मी.चौड़ी, हरे, पीले
रंग में रोमलि होती हैं। फल टहनियों के ऊपरी
भाग में पीले रंग में समीक्षाओं में लगे होते हैं।
फलियां 3 से 7.5 सें.मी. लम्बी, 2 से 2.5 सें.
मी. चौड़ी, गहरी भूरी होती हैं। फलियों के
अन्दर आधा मुख वाले अण्डाकार, चिकने तथा गहरे-भूरे बीज होते हैं, जो 5 से 6 की
संख्या में होते हैं।
सोनामुखीCassia Angustifolia Vahl
गुण-धर्म:
सनाय स्वाद में कड़वा और चरपरा होता है। स्वभाव से यह गरम
होता है। सनाय रक्तविकार, मुहासे, पेट की कब्ज़, पित्त विकारों तथा शारीरिक दर्द में
लाभ पहुंचाता है। कैंसर व ट्यूमर के उपचार में लाभदायक है। पशुओं की बीमारियों
में भी यह काफ़ी लाभदायक है।
औषधीय उपयोग:
सोनामुखीCassia Angustifolia Vahl की पत्ती का उपयोग आयुर्वेदिक, यूनानी व
एलोपैथिक दवाइयों के निर्माण में किया जाता है। इसकी पत्तियों को प्रमुख रूप से
सनिश्चित विरेचक औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। किसी भी प्रकार की
पुरानी कब्ज़ के निवारण हेतु इसे एक अत्यधिक सुरक्षित दवाई के रूप में जाना जाता
है। वर्तमान में यह कब्ज के निवारण हेतु बनने वाला अधिकाश दवाइयों का प्रमुख
घटक है।
* विभिन्न रक्त विकारों के उपचार हेतु इसका प्रयोग किया जाता है।
* चर्मरोगों में सिरके के साथ इसकी पत्तियों को पीसकर लेप करने से चर्मरोगों में
लाभ मिलता है।
* मुंह के मुहांसों, पेट की कब्ज़, पित्त विकारों तथा शारीरिक दर्द में
इसका प्रयोग किया जाता है। * सनाय के पौधे से प्राप्त रेजिन को यूनानी दवा' इत्रिफल
अस्तुकटस' में एक अवयव के रूप में प्रयोग किया जाता है। पशुओं से सम्बन्धित
बीमारियों के निवारण में भी यह काफी लाभकारी पाया गया है।
* इसके जूस तथा
पाउडर को कैंसर व ट्यूमर के उपचार में प्रयोग किया जाता है। इसकी औषधीय
मात्रा 3 रत्ती तक की है।
* जंगली आंवलों के रस के साथ सनाय को लेने से
ऊर्ध्वश्वास मिटता है।
* इनको पीपल की छाल के साथ लेने से मूढगर्भ छोड़ या गिर
जाता है।
* सनाय को आवंले के रस के साथ लेने से कुष्ठ और जलोदर में लाभ
होता है।
* इसको अनारदाने के रस के साथ लेने से छाती में आया हुआ ड्जा मिटता
है।
* सनाय को काली बकरी के दूध के साथ लेने से विषविकार मिटता है।
* सनाय ।
को बकरी के मूत्र के साथ लेने से पेट की शोध उतरती है।
* इसको जल भांगरे के रस के
साथ लेने से बाल काले होते हैं।
* सनाय को ऊंटनी के दूध के साथ लेने से मस्तक की
वायु पीड़ा मिटती है।
* इसको शक्कर के साथ लेने से पित्तविकार मिटता है।
सावधानी-जब कभी भी सनाय का उपयोग करें, कुछ सावधानी रखनी आवश्यक
है, जैसे इसे अधिक मात्रा में लेने से आंतों में मरोड़ होने लगती है तथा इससे
बेचैनी होती है। यह कब्ज़ उपचार में आश्रित हो जाता है। अत: जब भी इसका
सेवन करें, सोंठ अथवा गुलकन्द के साथ ही करें।
सोनामुखीCassia Angustifolia Vahl
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