आंवला और रोगों का उपचार :Amla and treatment of diseases
आयुर्वेद का ऐसा कोई भी ग्रन्थ नहीं है, जिनमें आँवले की प्रशंसा
न की गई हो। हमारे देश में ऑवला सर्व सुलभ है, लेकिन एक आम
आदमी के जीवन में आँवले का जितना प्रयोग होना चाहिए, उतना हो नहीं
रहा है। आँवला एक ऐसा दिव्य फल है, जो नित्य सेवन से हमारे शरीर
चारों ओर आरोग्य की ऐसी लक्ष्मण रेखा खींचता है कि 'महारोगों
का धारा इस लक्ष्मण रेखा के बाहर खड़ा-खड़ा बगलें झाँकता
है। हमारे धार्मिक ग्रन्थों में आँवले के प्रति अत्यधिक पूज्य भाव
दर्शाया गया है। हमारे सांस्कृतिक अनुष्ठानों में फलों के रूप में आँवले
का स्थान सर्वोपरि है। इसलिए हिन्दू ‘आँवला नवमी' के माध्यम से
आँवला वृक्ष की पूजा करके इसके प्रति आदर प्रकट करते हैं, साथ ही
अपनी कृतज्ञता भी, कि आँवले ने सदियों से समाज को रोगमुक्त रखने
में प्रमुख भूमिका निभाई है।
आँवले के विशिष्ट गुणों के आधार पर आँवले को विभिन्न संस्कृत
नामों से विभूषित किया है। इन नामों में प्रमुख हैं -
आमलकी, पंचरसा, श्री फली, शिवा, धात्रिका, व्यवस्था, अकरा,
वृस्यां कायस्था बहुफली, शांता, अमृतफला, रोचनी, निढया, धात्री
फल, श्री फल, शिव इत्यादि।
आँवले के इन संस्कृत नामों का ही यदि हम थोड़ा विश्लेषण करें,
तो हम आँवले के गुणों तथा उपयोगिता से परिचित हो सकते हैं।
आमलकी - संस्कृत में आँवले का एक नाम ‘आमलकी' है। यहाँ
आमलकी का आशय अम्ल रस से है। आँवले की सबसे बड़ी विशेषता
उसका अम्ल रस प्रधान होना है। इस गुण के कारण आँवला वायु को
नष्ट करता है, अर्थात् वातजन्य दोषों का शमन आँवला अत्यंत निर्दोष
पद्धति से करता है।
|पंचरसा - आँवले को ‘पंचरसा' भी कहा गया है, क्योंकि आँवला
अपने आप में पाँच रसों को समाये रहता है, यथा मधुर रस, अम्ल
कटु रस, तिक्त रस, कषाय रस। आँवले में केवल लवण रस नही
होता है।
शांता - आँवला अपने अम्लीय गुण के कारण वायु को नष्ट कर
है, मधुर रस तथा शीत वीर्य होने के कारण पित्त का नाश करता है तो
रूक्ष तथा कसैला होने के कारण कफ को नष्ट करता है। इस पर
आँवला वात, पित्त तथा कफ इन त्रिदोषों को नष्ट करता है या -
शांत करता है। त्रिदोषों की शांति ही वास्तविक आरोग्य है। इसलिए
‘शांता' नाम दिया गया है।
धात्रिका - आँवला 'धात्रिका' नाम से भी प्रसिद्ध है, धात्री का
अर्थ माता होता है अर्थात् आँवला एक माँ की भाँति मानव समाज के
आरोग्य का रक्षण करता है तथा रोगों के प्रतिकार के लिए एक सुरक्षा
कवच का कार्य करता है।
अमृतफला - संसार का सर्वाधिक मूल्यवान यदि कुछ है, तो वह
है अमृत। इसी अमृत के लिए हुआ था - समुद्र मंथन। हमारे आयुर्वेद
महर्षियों ने आँवले के गुणों का जो विवेचनात्मक तथा विश्लेषणात्मक
मंथन प्रस्तुत किया है, उससे आँवला अमृत के सदृश्य फल नजर आता
है। यही कारण है कि आयुर्वेद महर्षियों ने इसे ‘अमृतफला' नामक
विशेषण से अलंकृत किया है, जिसमें किंचित मात्र भी अतिशयोक्ति नहीं
है। मानव मात्र के लिए कल्याणकारी होने के कारण इसे कल्याणकारी
शिव का नाम 'शिवा' दिया गया है।
आँवले के गुण - महर्षि चरक के अनुसार आँवला अवस्था
स्थापक द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ है। आँवला शीत वीर्य होने के कारण, पंचरस
प्रधान होने के कारण, ग्राही होने के कारण, मूत्रल होने के कारण तथा
मुख्यतः रक्त शोधक होने के कारण यह प्रमेह, अतिसार, दाहकता,
कामला, अम्ल पित्त, पांडु, रक्त पित्त, वात रक्त, बवासीर, रक्त विकार,
केशों के विभिन्न रोग, अरुचि, श्वास, खाँसी, मेद वृद्धि, मूत्र कृच्छ तथा
त्रिदोषों का शमन करने वाला होता है।
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रक्त-शोधक - रोग निवारण में आँवले का बहुआयामी होने का मुख्य कारण इसका रक्त शोधक' होना है। यदि हमारा रक्त शुद्ध है रक्त
में कोई विकृति नहीं है तथा रक्त प्रवाह संतुलित है, तो यह स्वस्थ रक्त
के लक्षण हैं। ऐसा रक्त शरीर में किसी भी व्याधि को फटकने नहीं देता
तथा विजातीय तत्वों को प्राकृतिक ढंग से शरीर के बाहर कर देता है,
किन्तु आहार विहार की अनियमितता से हमारे शरीर में विजातीय तत्व
जैसे क्षार, अम्ल, कृमि इत्यादि एकत्रित होने लगते हैं। फलस्वरूप रक्त
दुषित होने लगता है और नाना प्रकार की व्याधियाँ घेरने लगती हैं। इन
विजातीय तत्वों को दूर करने के लिए रसायन शास्त्रियों ने बरसों की
खोज व अनुसंधान के पश्चात् यह निष्कर्ष निकाला कि आँवला ऐसा
फल है, जो शरीर से विजातीय तत्वों को निकाल बाहर करने में पूर्णतः
सक्षम है। आँवले का नियमित सेवन रक्त को शुद्ध करके विभिन्न
व्याधियों तथा वृद्धावस्था पर विजय पाकर नवयौवन प्राप्ति में सहायक
सिद्ध हुआ है।
विटामिन का स्रोत :
आँवले को अमृतफल कहने का सबसे
सशक्त आधार इसमें विटामिन सी की अतुलनीय प्रचुरता का होना है।
आँवले को विटामिन सी का भण्डार कहा जाता है। विटामिन सी वर्ग के
फलों में विटामिन सी की मात्रा देखने से ज्ञात होता है कि आँवला
विटामिन सी के लिहाज से अतुलनीय है क्योंकि 100 ग्राम सेव में
विटामिन सी 2 मिलीग्राम; 100 ग्राम नींबू में 63 मिलीग्राम; 100 ग्राम
अनन्नास में 63 मिलीग्राम; 100 ग्राम अनार में 16 मिलीग्राम; 100
ग्राम संतरे में 68 मिलीग्राम; 100 ग्राम अमरूद में 200 मिलीग्राम
विटामिन सी होता है, जबकि 100 ग्राम आँवले में 600 मिलीग्राम
विटामिन सी होता है।
खाद्य द्रव्यों का स्रोत:
- विटामिन सी की प्रधानता के साथ-साथ
आँवले में अनेक खाद्य द्रव्य भी होते हैं, जैसे कार्बोहाइड्रेट, गैलिक
एसिड, टैनिक एसिड, निर्यास, अलब्युमिन, सेल्युलोज, कैल्शियम आदि।
साथ ही इसमें पंच रस - मधुर, अम्ल, कटु, तिक्त तथा कषाय होते हैं,
जो पाचन संस्थान पर स्थाई व उत्तम प्रभाव डालते हैं, जिससे पाचक
रसों की उत्पत्ति समुचित मात्रा में होती है। इसके सेवन से आंतों द्वारा
पाचन, अवशोषण तथा मल का निर्हरण नियमित रूप से होता है।
आँवले के विविध उपयोग - आँवले को कच्चा तथा पकाकर भी
खाया जा सकता है। इसका रस 10 से 15 ग्राम सुबह-शाम सेवन कर
सकते हैं। सुखाकर इसका चूर्ण बनाकर भी रख सकते हैं। 1 से 2 चम्मच
चूर्ण सुबह-शाम लेना गुणकारी है।
भोजन के साथ आँवले की चटनी का सेवन स्वादप्रद तो रहता ही
है, स्वास्थ्य के लिए भी अत्यधिक लाभदायक है।
च्यवनप्राश जीवनदायिनी औषधि आँवले से ही बनती है।
आँवले को शरबत, चटनी, मुरब्बा, अवलेह, औषधि या किसी भी
रूप में सेवन किया जाये, इससे मिलते हैं सिर्फ लाभ और आरोग्य, तभी
तो इसे अमृत फल के ताज से विभूषित किया गया है।
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