नट और तेनालीराम
नट और तेनालीराम
प्राचीन काल की बात है । दक्षिण भारत में विजय नगर नामक राज्य था । उसमें कृष्णदेव राय नामक राजा राज करते थे। उन में एक चतुर व्यक्ति था, उसका नाम तेनालीराम था। वह समस्या का समाधान बड़ी चतुराई से कर देता था। इस कारण राजा
उससे बहुत प्रसन्न रहते थे । वे सदैव तेनालीराम को अपने साथ रखते थे और उसकी बात का भी बहुत आदर करते थे ।
एक दिन राजा अपने दरबार में सभी दरबारियों के साथ बैठे थे। तभी वहाँ एक नट आया और राजा से अपने करतब दिखाने की आज्ञा माँगने लगा । राजा ने उसकी प्रार्थना सुनकर करतब दिखाने की स्वीकृति दे दी। नट ने तुरंत राजमहल के सामने खुले मैदान में अपने साथियों की सहायता से दो लंबे-लंबे बाँस खड़े किए और उनके बीच में बिलकुल पतली, किंतु बहुत मजबूत रस्सी बाँध दी । सभी लोग हैरानी से नट के कारनामें देखने लगे। देखते-देखते नट उन बाँसों पर फुर्ती से चढ़ गया। फिर उस रस्सी के ऊपर एक-एक पैर रखता हुआ वह एक छोर से दूसरे छोर की ओर जाने लगा । लोग उसको देखकर सोच रहे थे कि वह अब गिरा कि अब गिरा। किंतु नट बड़ी कुशलतापूर्वक उस रस्सी पर चलता हुआ दूसरे छोर तक पहुँच गया । यह देखकर राजा और सभी दरबारी खुश होकर ताली बजाने लगे । उसके बाद नट ने उस रस्सी पर कई और करतब दिखाए।
कभी वह एक पैर पर खड़ा हो जाता और कभी दोनों पैरों के बीच रस्सी पकड़कर उलटा लटक जाता । उसके ऐसे अनोखे करतबों ने सभी को हैरान कर दिया। जब खेल समाप्त हुआ तो तालियों की गड़गड़ाहट से सारा वातावरण गूंज उठा। राजा प्रसन्न होकर बोले-‘वाह ! आपने तो अपने करतबों से हमें प्रसन्न कर दिया । माँगो, क्या माँगते हो ?'
नट भी बहुत चतुर था । तुरंत बोला- “महाराज ! आप कुछ ऐसा कीजिए कि मैं प्रसन्न हो जाऊँ ।'
राजा बोले-“हाँ, हाँ, अवश्य ! यह लो दो सौ स्वर्ण मुद्राएँ ।' नट ने हाथ जोड़ दिए, किंतु मुद्राएँ नहीं ली ।
राजा बोले -अच्छा। चलो तीन सौ मुद्राएं ले लो | नट फिर हाथ जोड़कर खड़ा रहा | राजा ने उसे अपने गले का बहुमूल्य मोतियों का हार भी उतार कर दे डाला। किन्तु नट ने उसे हाथ तक नहीं लगाया।
यह देखकर राजा अत्यधिक परेशान हुए ।कि आखिर' नट को किस प्रकार प्रसन्न करे। राजा ने तेनालीराम की ओर देखा । तेनालीराम राजा का संकेत समझ गए। वे अपने स्थान पर खड़े होकर बोले "महाराज ! हमें नट को प्रसन्न करने के लिए केवल एक दिन का समय चाहिए ।''
राजा समा गए कि तेनालीराम इस समस्या का समाधान कर सकते हैं। उन्होने नट से कहा- ''नटराज जी, आज आप हमारा आतिथ्य स्वीकार कीजिए । कल हम इसी समय, इसी दरबार में आपको प्रसन्न कर देगे। नटराज बोला- ''जैसी महाराज की आज्ञा ।''
यह कहकर नट दरबार से चला गया ।
नटराज के जाने के बाद तेनालीराम राजा से बोले- ‘‘महाराज ! मैं चाहता हूँ कि कल जब नट दरबार में उपस्थित हो तो सभी दरबारी एक-एक करके आपके सामने आएँ और कहें, ‘‘महाराज ! आपके यहाँ पुत्र-जन्म का समाचार सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।''
दूसरे दिन राजा के आदेशानुसार सभी दरबारी दरबार में हाजिर हुए। जब नट दरबार में आया तो सबसे पहले प्रधानमंत्री उठे और राजा के सामने प्रणाम करते हुए बोले-‘‘महाराज की जय हो ! मैंने सुना है। आपके यहाँ पुत्र-जन्म हुआ है। यह समाचार सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।'' । इसके बाद एक-एक दरबारी राजा के सामने आकर बोला- “महाराज की जय हो ! महाराज मैं भी बहुत प्रसन्न हूँ।'' अंत में जब नट की बारी । आई तो वह बड़ा परेशान होने लगा कि क्या करूँ, क्या न करू । वह समझ गया कि राजा ने उसे चुप कराने के लिए यह उपाय खोजा है । वह
बेमन से उठा और राजा के सामने आकर अन्य दरबारियों की भाँति बोला- ‘‘महाराज ! की जय हो ! मैं भी बहुत प्रसन्न हूँ ।'' राजा तुरंत बोले- ‘‘देखा नटराज ! आखिर हमने आपको प्रसन्न कर ही दिया। फिर भी ये सौ स्वर्ण मुद्राएँ लेते जाइए।'' नटराज अपना-सा मुँह लेकर रह गया और दरबार से चला गया।
राजा ने तेनालीराम को भी एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ देते हुए कहा-“वाह ! तेनालीराम तुम्हारा कोई जवाब नहीं। आज हम भी बहुत
प्रसन्न हैं।''
