संधि

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तेनालीराम के  किस्से
तेनालीराम के किस्से


एक समय की बात है । विजय नगर के राजा कृष्णदेव राय का अपने पड़ोसी राज्य से मन मुटाव चल रहा था । वहाँ के लोगों ने तेनालीराम के विरोधियों को तेनालीराम के खिलाफ मौका देखकर भड़का दिया ।
“महाराज तेनालीराम हमारे पड़ौसी राजा के यहाँ जिनसे हमारा झगड़ा चल रहा है, उनसे मिले हुए हैं।''
-एक विरोधी ने कहा। ‘‘क्या कहते हैं आप ?'' राजा भड़क उठे ।।
‘‘हाँ महाराज, मैंने इसकी पूरी जांच पड़ताल करा ली है, उसके बाद ही सच्चाई बतायी है ।''
“लेकिन तेनालीराम के गुणों से मैं अच्छी तरह परिचित हैं । यह कैसे हो सकता है ?'' राजा ने कहा ।
‘‘हाँ महाराज, हम भी ऐसा ही समझते थे-लेकिन सच्चाई यही है, जो अब हमें पता लगी है।'' | अकेले में राजा ने तेनालीराम को बुलवाया । वही बात सामने आई, “तेनालीराम तुम हमारे दुश्मन राजा से मिले हुए हो, यहाँ की खबरें वहाँ पहुँचाते हो ।''-राजा ने पूछा ।
यह सुनकर तेनालीराम हक्के-बक्के रह गए कि यह महाराज क्या कह रहे हैं । वे समझ गए कि यह विरोधियों की चाल है । चाल का जवाब किस प्रकार से दें, यह तेनालीराम अच्छी तरह जानते थे । | वे सिर झुकाकर चुपचाप खड़े रहे । राजा ने चुप रहने पर उनका अपराध स्वीकार कर लिया और आदेश दे दिया “कल ही मेरा राज्य छोड़कर चले जाओ और उसी राजा के यहाँ रहो, जो मेरा दुश्मन है । मुझे तुम्हारी सूरत से भी नफरत है ।

तेनालीराम ने अगले ही दिन राज्य छोड़ दिया। वे विरोधी राजा के

यहाँ पहुँचे तो सैनिक उन्हें पकड़कर राजा के सामने ले आये व बोले- “महाराज-यह पड़ोसी राज्य के यहाँ से भेजा गया गुप्तचर है । हमारी सूचनाएँ लेने आया है ।''-सैनिक ने कहा ।

राजा ने जब पूछताछ शुरू की तो पता चला कि यह तेनालीराम हैं, जिनके किस्से राजा भी सुन चुके थे । राजा ने उन्हें बड़ा आदर सम्मान दिया और यहाँ आने का कारण पूछा। तेनालीराम ने कहा ''हमारे राजा आपसे संधि करना चाहते हैं।'' | ‘‘संधि तो हम भी करना चाहते हैं लेकिन इसकी पहल राजा की ओर से होनी चाहिए।'

हाँ, मैं उसी की पहल करने ही तो आया हूँ ।''तेनालीराम ने बताया।

‘ऐसी बात है तो बताइए मुझे क्या करना है ?'' राजा ने पूछा। “करना क्या है-आप भी अपना दूत भेजकर इस संधि पर अपनी पक्की मोहर लगाकर राजा के यहाँ भेज दीजिए ।''

इस प्रकार राजा ने संधि-पत्र के साथ अपना दूत पड़ोसी राजा के यहाँ भेज दिया, जहाँ से तेनालीराम आए थे ।
देखते ही देखते दुश्मनी-दोस्ती में बदल गई । राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ । उन्होंने तेनालीराम को वापस शाही-सम्मान के साथ अपने दरबार में बुलवाया ।।
इस तरह अब एक नहीं दो राजाओं ने तेनालीराम का स्वागत किया। उनके विरोधियों ने देखा तो उनकी शरम से गर्दन झुक गई ।।

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