नीम और रोगों का उपचार
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treatment of neem and diseases
भारत वर्ष में अनादि काल से नीम के वृक्ष के विभिन्न भागों का
प्रयोग होता आ रहा है। नीम के औषधीय महत्व को देखते हुए ही
अमेरिका जैसे घाघ देश इसके पेटेंट के लिए तिकड़में लगा रहे हैं। हमारे
देश के विभिन्न अंचलों में नीम का विविध प्रकार से प्रयोग किया जाता
है। प्रस्तुत है नीम के इन प्रयोगों का विविध स्वरूप।
फोड़े-फुसी -
धुएँ की कालिख को इकट्ठा करके उसमें नीम के
पिसे हुए पत्ते एवं घी मिलाकर फंसी पर लगाने से लाभ होता है। इसी
तरह लगभग 25 ग्राम नीम के बीजों को बरीक पीस लेते हैं। फिर एक
मिट्टी के बर्तन में सरसों के तेल को धुआँ निकलने तक गर्म होने पर इन
बीजों का चूर्ण डाल देते हैं। कुछ समय बाद बर्तन को उतारकर तेल के
ठण्डा होने पर शीशी में भर लेते हैं। इस तेल को फोड़े-फुसी पर लगाने
से लाभ होता है।
खुजली -
नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर पानी को ठण्डा करके नहाने से खुजली व चर्म रोग में लाभ होता है। दमा -
इसके तने से निकलने वाले रस को पीने से दमा ठीक होता है
छाले -
नीम की छाल को पत्थर से घिसकर बारीक करके चूर्ण
बनाते हैं। इस चूर्ण को घी में मिलाकर लगाने से छाले में लाभ होता है।
नीम की छाल का अर्क बाजार में मिलता है। छाले में यह भी लाभकारी
बुखार -
नीम की पत्ती के डण्ठल को पत्थर पर घिसकर थोड़े पानी
में गर्म करके 4-5 बताशे डालकर मरीज को पिलाने से बुखार में लाभ
होता है। इसी तरह नीम की पत्तियों को अच्छी तरह पीसकर पानी में
घोलकर पिला देते हैं। नीम की कोपलें खाने से भी बुखार ठीक हो जाता
है। कई लोग नीम के तने की छाल को बारीक पीसकर पानी में घोलते
हैं। फिर पानी को कपड़े से छानकर रोगी को पिला देते हैं।
मलेरिया
-
मलेरिया होने पर नीम के तने की अंदर की छाल को
कूटकर काँसे के बर्तन में
पानी के साथ गुनगुना करते हैं। इसे कप छानकर मिश्री के साथ खाली पेट एक खुराक
देने से मलेरिया टर जाता है। पत्तियाँ खाने से मलेरिया में राहत मिलती है।
फूल आने पर नीम के फूलों को पीसकर 15 दिन तक खाने से मलेरिया नहीं होता है।
बाढी - बादी होने पर शरीर के प्रभावित अंग पर नीम की गोंद के
लेप लगाने से बहुत आराम मिलता है।
पानी के साथ गुनगुना करते हैं। इसे कप छानकर मिश्री के साथ खाली पेट एक खुराक
देने से मलेरिया टर जाता है। पत्तियाँ खाने से मलेरिया में राहत मिलती है।
फूल आने पर नीम के फूलों को पीसकर 15 दिन तक खाने से मलेरिया नहीं होता है।
बाढी - बादी होने पर शरीर के प्रभावित अंग पर नीम की गोंद के
लेप लगाने से बहुत आराम मिलता है।
क्षय रोग -
नीम के पेड़ की जड़ के सिरे को मिट्टी से बाहर
निकालते हैं तथा जड़ का एक किनारा काट देते हैं।
कटे हुए सिरे पर एक बर्तन रख देते हैं तथा उसे अच्छी तरह ढंककर मिट्टी डाल देते हैं।
बाद में मिट्टी खोदकर बर्तन को बाहर निकालते हैं।
इसमें एक तरह का द्रव एकत्रित हो जाता है। इसे शीशियों में भर लेते हैं।
इस रस को प्रतिदिन सुबह लेने से कुछ ही दिनों में क्षय रोग दूर हो जाता है।
कटे हुए सिरे पर एक बर्तन रख देते हैं तथा उसे अच्छी तरह ढंककर मिट्टी डाल देते हैं।
बाद में मिट्टी खोदकर बर्तन को बाहर निकालते हैं।
इसमें एक तरह का द्रव एकत्रित हो जाता है। इसे शीशियों में भर लेते हैं।
इस रस को प्रतिदिन सुबह लेने से कुछ ही दिनों में क्षय रोग दूर हो जाता है।
सर्दी-जुकाम होना -
नीम के हरे पत्ते एवं काली मिर्च को लगभग दस दिनों तक फाँकने से जुकाम व कफ दूर हो जाता है।
कान में कीड़ा -
कान में कीड़ा हो जाने पर नीम के तने की छाल का रस कान में डालते हैं तथा कुछ समय बाद रस को कान से बाहर निकालते हैं। इससे कान के कीड़े खत्म हो जाते हैं।
सिर दर्द -
सिर में दर्द होने पर नीम की गोंद को दर्द वाली जगह पर लगाने से तुरंत लाभ होता है।
पेट दर्द -
नीम की पत्तियों को बारीक पीसकर रस निकालकर प्रातः रोज एक गिलास पीने से पेट की बीमारियाँ दूर हो जाती हैं। नीम के पत्ते, आक के फूल, लौंग व इलायची को मिलाकर पीसकर इसमें चीनी का शीरा डालकर गोलियाँ बनाते हैं। पेट दर्द में ये गोलियाँ लाभकारी हैं। इसी तरह कुछ अंचलों में नीम की छाल को लेकर जलाकर फिर पीसकर कपड़े से छाने लेते हैं। पेट की बीमारी में रोगी को एक-डेढ़ चम्मच पानी के साथ फाँकने देते हैं।
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